अलविदा!!!
आज फिर उनसे बात हुई,
मगर
इस बार एक दोस्त बनकर नहीं...
बस अजनबी बनकर..
थोड़ा बुरा लगा!!
इस तरह खुदको झुठलाकर..
पर
मजबूर भी उन्ही ने किया था..
मैं "कैसे हो" कहकर रूक गई,
जवाब में "ठीक नहीं हूं!!" सुनकर दिलसे दुख हुआ..
पर बात को अनसुना कर बात को खत्म कर दिया..
सच कहूं तो उसने जो नही कहा, वह भी सुन लिया था मैंने..
क्यूकी, में उसकी रूह को पहचानती हूं..
वो चाहे या ना चाहे मुझे,
माने या ना माने,
पास रहे या दूर,
फिर भी उसको सुन सकती हूं, महसूस कर सकती हूं...
उसके दुखी होने पर मेरा दिल आज भी रोता है..
उसे खुश देखकर में भी खिलखिलाती हूं..
न जाने कोन हूं मैं उसकी???
पर कुछ हूं जरूर!!
तभी तो, आपने आने की खबर दे चुका था...
पर मजबूरियों के कटघरे में खड़ा भी वही कर कर गया..
बुलाकर भी नही बुलाना समझ गई थी में..
मैंने भी खबर जानकर, मिलूंगी दिखाया,
पर मिली नही...
क्यूकी, उसकी खुशी इसी में थी!!
और
मेरी उसमे!!
न जाने और कितने अलविदा कहने पड़ेंगे??
बस उसकी खुशी के लिए...
न जाने और कितने बार मरकर भी जीना पड़ेगा??
बस उसकी हसी के लिए...
_निधि ६ जून २०२२
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