उलझन
जिंदगी के उस मोड़ पे हूं जहां मैं सबके साथ होकर भी कभी कभी अकेला महसूस करती हूं
अपनो को सहारा देते देते खुद सहारा ढूंढना जैसे भूल ही गई हूं कभी रोने का मन होकर
भी हसीं के पीछे छिपाती हूं कभी बेवजह ही खुदपे गुस्सा आता है जिंदगी क्या मोड़
लेगी ये सोचके आजकल डर लगता है इन दिनों बोहोत अजनबियों से मिलने का मौका मिला
मिलकर लगा की जिंदगी इतनी भी बुरी नहीं है ये सच को अपनाने ही वाली थी की किसी ने
मेरा दरवाजा खटखटाया मैंने भी सावधानी से झांक कर देखा देखा तो क्या था _ पुराने
अच्छे पलो की कुछ बुरी यादें में समझ ही नहीं पायी क्या करू यादें बुरी जरूर है ,
पर पल तो हसीन थे उन्हें आंचल में समेट कर रखूं या फिर लौट जाने को कहूं मेरी बात
मानेंगे क्या ?? ये भी सवाल था मन में और जो आज मेरे सामने है जिस आज में कुछ पल के
लिए ही सही पर खुश हूं उसको कहा जगह दू मौका दू भी या नहीं या फिर से वही कहानी
दोहरायी जायेगी क्या जिंदगी फिर वही मोड़ लेगी अजीबसी उलझन है _निधि २७/०५/२०२२
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